Aravali Crisis: आज हम बात करेंगे अरावली पहाड़ियों पर गहराते संकट की…और उस संकट से उबरने की सतत विकास के लिए मज़बूत कानून और नीति की.
तीसरे श्रीमती लक्ष्मी देवी मेमोरियल नेशनल सेमिनार में कही गई बातें.
दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक अरावली पर्वतमाला आज अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रही है.
गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली अरावली ….केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के लिए हरे फेफड़ों” की तरह काम करती है.
इसके बावजूद अवैध खनन, बेतहाशा शहरीकरण और कमजोर प्रशासनिक नियंत्रण ने… इस प्राचीन धरोहर को …खतरे में डाल दिया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतना अहम क्यों है अरावली पर्वतमाला?
अरावली पर्वतमाला— थार मरुस्थल के पूर्व की ओर बढ़ते विस्तार को रोकती है
ये पर्वत ऋंखला भूजल पुनर्भरण (Aquifer Recharge) का प्रमुख क्षेत्र है
जैव विविधता और वन्यजीव गलियारों का आश्रय स्थल है
दिल्ली-NCR सहित आसपास के क्षेत्रों की जलवायु को संतुलित करती है
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अरावली का क्षरण इसी गति से जारी रहा, तो मरुस्थलीकरण, जल संकट और तापमान वृद्धि जैसी समस्याएँ और गंभीर हो सकती हैं.
ऐसे में असली टकराव विकास बनाम पर्यावरण का है.
तेज़ आर्थिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की दौड़ में अरावली क्षेत्र में अवैध और अंधाधुंध खनन की बात दशकों से सामने आ रही है.
यहां जंगलों की कटाई विकास के नाम पर है, जो एक बहुत बड़ा संकट है
रियल एस्टेट परियोजनाओं का भारी दबाव है.
सवाल यह है कि क्या विकास की यह परिभाषा भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की अनदेखी करके तय की जानी चाहिए?
ऐसे में गौर करें तो सतत विकास …सिर्फ़ विचार नहीं, बल्कि कानूनी ज़िम्मेदारी है
भारत में सतत विकास केवल एक पर्यावरणीय विचार नहीं, बल्कि संवैधानिक और न्यायिक रूप से मान्यता प्राप्त सिद्धांत है
हमारे भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कानूनी प्रावधान हैं, उस पर गौर फरमाएंगे …
लेकिन उसके पहले एक बार फिर अरावली की बात करते हैं.
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जो गुजरात से दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर तक फैली हुई है
इसका अधिकांश विस्तार राजस्थान में स्थित है.
अरबों साल पहले बनी ये पर्वतमालाएँ अत्यधिक अपरदित यानी घिसी हुई हैं.
और मुख्य रूप से ग्रेनाइट और कायांतरित चट्टानों जैसी प्राचीन चट्टानों से बनी हैं.
इसकी सबसे ऊँची चोटी ‘गुरु शिखर’ है, जो माउंट आबू में स्थित है और लगभग 1,722 मीटर की ऊँचाई तक उठती है.
यह पर्वतमाला एक प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करके पर्यावरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
यह थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकती है और क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करने में सहायता करती है.
अब हम बात करेंगे भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए बने कानूनी प्रावधानों की.
संविधान का अनुच्छेद 48A कहता है कि ये राज्य का दायित्व है कि वो पर्यावरण संरक्षण करे.
कांस्टीट्यूशन का अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों को ये बोध कराता है कि ये उनका मौलिक कर्तव्य है कि वो पर्यावरण को बचाए रखें…
इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
वन संरक्षण अधिनियम, 1980
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश, जिनमें अरावली क्षेत्र में खनन पर सख़्त रुख अपनाया गया है
इतना ही नहीं भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि Precautionary Principle और Polluter Pays Principle पर्यावरणीय मामलों की रीढ़ हैं.
ऐसे में सवाल ये है कि नीतिगत समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक अरावली के संरक्षण के लिए केवल कानून ही काफी नहीं हैं, बल्कि ठोस नीतिगत क्रियान्वयन ज़रूरी है—
इसके लिए बड़े पैमाने पर वनीकरण होना चाहिए. इसके लिए ग्रीन वॉल की पहल होनी चाहिए
पारंपरिक जोहड़ों और जल संरचनाओं की बहाली पर जोर देना होगा.
वन्यजीव गलियारों को कानूनी सुरक्षा देनी होगी
सतत खनन पद्धतियों का सख़्ती से पालन करना पड़ेगा
स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन में भागीदारी देनी होगी
इको-टूरिज्म को बढ़ावा देना होगा, लेकिन वो भी पर्यावरणीय सीमाओं के दायरे में रहकर
कॉर्पोरेट सेक्टर की सक्रिय भूमिका और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी CSR ज़वाबदेही भी तय करनी पड़ेगी.
इन सब पर पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली पहाड़ियों का संरक्षण—
केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं
बल्कि संवैधानिक कर्तव्य है
नीतिगत ज़रूरत है
और पीढ़ीगत न्याय का सवाल है
यहां पर हम महात्मा गांधी के प्रसिद्ध कथन को कोट करेंगे, जो आज उससे ज्यादा प्रासंगिक है—जितना पहला हुआ करता था.
बापू ने कहा था कि ये धरती हर इंसान की ज़रूरतें पूरी करने के लिए काफी है,
लेकिन हर इंसान के लालच के लिए नहीं…,
और अरावली संकट इसी लालच और विकास की गलत समझ का परिणाम माना जा रहा है.
ऐसे में इसका सीधा निष्कर्ष ये है कि अरावली बची, तो भविष्य बचेगा…
अगर आज कानून और नीतियों को ज़मीन पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी
ऐसे में अरावली को बचाना दरअसल भारत के पर्यावरणीय भविष्य को बचाना है.
