अरावली पहाड़ियों पर संकट: सतत विकास के लिए मज़बूत कानून और नीति की ज़रूरत क्यों?
लखनऊ, 8 मई। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली पर्वतमाला आज अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रही है। गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली अरावली केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के लिए “हरे फेफड़ों” की तरह काम करती है। इसके बावजूद अवैध खनन, बेतहाशा शहरीकरण और कमजोर प्रशासनिक नियंत्रण ने इस प्राचीन धरोहर को खतरे में डाल दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में नर्वदेश्वर विधि महाविद्यालय, लखनऊ में 8 और 9 मई को आयोजित होने वाले तीसरे श्रीमती लक्ष्मी देवी मेमोरियल स्मृति नेशनल सेमिनार में अरावली पहाड़ियों के संदर्भ में सतत विकास के विधिक और नीतिगत ढाँचे पर गंभीर विमर्श किया जाएगा।
क्यों अहम है अरावली पर्वतमाला?

अरावली पर्वतमाला—
- थार मरुस्थल के पूर्व की ओर बढ़ते विस्तार को रोकती है
- भूजल पुनर्भरण (Aquifer Recharge) का प्रमुख क्षेत्र है
- जैव विविधता और वन्यजीव गलियारों का आश्रय स्थल है
- दिल्ली-NCR सहित आसपास के क्षेत्रों की जलवायु को संतुलित करती है
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अरावली का क्षरण इसी गति से जारी रहा, तो मरुस्थलीकरण, जल संकट और तापमान वृद्धि जैसी समस्याएँ और गंभीर हो सकती हैं।

विकास बनाम पर्यावरण: असली टकराव
तेज़ आर्थिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की दौड़ में अरावली क्षेत्र में—

- अवैध और अंधाधुंध खनन
- जंगलों की कटाई
- रियल एस्टेट परियोजनाओं का दबाव
तेज़ी से बढ़ा है। सवाल यह है कि क्या विकास की यह परिभाषा भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की अनदेखी करके तय की जानी चाहिए?
सतत विकास: सिर्फ़ विचार नहीं, कानूनी ज़िम्मेदारी
भारत में सतत विकास केवल एक पर्यावरणीय विचार नहीं, बल्कि संवैधानिक और न्यायिक रूप से मान्यता प्राप्त सिद्धांत है।

प्रमुख कानूनी प्रावधान
- संविधान का अनुच्छेद 48A – राज्य का दायित्व: पर्यावरण संरक्षण
- अनुच्छेद 51A(g) – नागरिकों का मौलिक कर्तव्य
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश, जिनमें अरावली क्षेत्र में खनन पर सख़्त रुख अपनाया गया है
भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि Precautionary Principle और Polluter Pays Principle पर्यावरणीय मामलों की रीढ़ हैं।
नीतिगत समाधान क्या हो सकते हैं?
विशेषज्ञों के मुताबिक अरावली के संरक्षण के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत क्रियान्वयन ज़रूरी है—
- बड़े पैमाने पर वनीकरण और “ग्रीन वॉल” पहल
- पारंपरिक जोहड़ों और जल संरचनाओं की बहाली
- वन्यजीव गलियारों की कानूनी सुरक्षा
- सतत खनन पद्धतियों का सख़्त पालन
- स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन में भागीदारी
- इको-टूरिज्म को बढ़ावा, लेकिन पर्यावरणीय सीमाओं के भीतर
- कॉर्पोरेट सेक्टर की सक्रिय भूमिका और CSR जवाबदेही
गांधी का विचार और आज की चुनौती
महात्मा गांधी का प्रसिद्ध कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“पृथ्वी हर इंसान की ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन हर इंसान के लालच के लिए नहीं।”
अरावली संकट इसी लालच और विकास की गलत समझ का परिणाम माना जा रहा है।
निष्कर्ष: अरावली बची, तो भविष्य बचेगा
पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली पहाड़ियों का संरक्षण—
- केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं
- बल्कि संवैधानिक कर्तव्य,
- नीतिगत आवश्यकता
- और पीढ़ीगत न्याय का सवाल है।
अगर आज कानून और नीतियों को ज़मीन पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
अरावली को बचाना दरअसल भारत के पर्यावरणीय भविष्य को बचाना है।
