Sunday, February 1, 2026
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FATEHPUR FORUM: 200 से अधिक लोगों की मशाल बना फतेहपुर फोरम, अंधेरे को काफी पीछे छोड़ चुका “हमारा फतेहपुर”, जानें सब कुछ

Fatehpur Forum: कहते हैं कि जब ऊपर वाले ने जिंदगी एक दी है, तो दो बार क्या सोचना। जिस माटी की उर्वरा ने हम सबको इस लायक बनाया कि हम कुछ कर सकते हैं। अपनों के लिए। अपने गांव के लिए। अपने जिले के लिए। अपने समाज के लिए। अपनी माटी के लिए। तो आखिर क्यों न करें। फतेहपुर जिले को लेकर ऐसी ही एक सोच की एक चिंगारी से रोशनी निकली थी, जो अब मशाल बन चुकी है। ये मशाल अब 200 से अधिक लोगों के हाथों में पहुंच गई है। हां, हम बात कर रहे हैं प्रदीप कुमार श्रीवास्तव और उनके फतेहपुर के और साथियों की। तकरीबन डेढ़ दशक पहले दिल्ली की एक बैठकी में लिया गया ये संकल्प, आज एक विशालकाय वृक्ष बन गया है। इस पेड़ पर फल हैं। छांव है। इतना ही नहीं, इसमें धूप और बारिश से बचाने की कूवत भी है। इस संकल्प का नाम है फतेहपुर फोरम (Fatehpur Forum)। आज यह फोरम अपनी माटी के लिए बहुत कुछ कर रहा है और बहुत कुछ करने को बेताब है। कुछ दिन पहले ही हमारी मुलाकात हुई थी फोरम के अध्यक्ष पूर्व डीजीपी प्रदीप कुमार श्रीवास्तव से। इस दौरान उनसे फतेहपुर फोरम और फोरम के फ्यूचर मिशन को लेकर बहुत-सी बातें हुईं। पेश है उसकी बानगी:

सवाल: आप उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिलों में शुमार फतेहपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। चंद लाइनों में इस जिले की तस्वीर को बयां करिए।

प्रदीप श्रीवास्तव: मैं उत्तर प्रदेश के फतेहपुर ज़िले का रहने वाला हूं, लेकिन 1977 से पुलिस की ट्रेनिंग के बाद दिल्ली में नौकरी के सिलसिले में आ गया था। मैं सन् 2005 से 2010 तक दिल्ली MCD में मुख्य सतर्कता अधिकारी (Chief Vigilance Officer) रहा। यहां मैं यह जरूर बताना चाहूंगा कि फतेहपुर यूपी का एक बहुत पुराना जिला है और गंगा जमुना के दोआबे में स्थित होने के बावजूद भी बेहद पिछड़ा हुआ था। ज़िले के तीनों कोनों पर तीन बड़े शहर, कानपुर, इलाहाबाद और लखनऊ होने के कारण न वहां बाज़ार पनप सके और न ही पढ़ाई के बड़े संस्थान। जिसको कुछ भी खरीदना होता था, वह कानपुर चला जाता। पढ़ाई के लिए इलाहाबाद से अच्छी और कौन सी जगह हो सकती थी? घूमने-फिरने के लिए तो नवाबों का शहर लखनऊ था ही। नतीजा यह था कि फतेहपुर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (गदर) के बाद करीब-करीब वहीं खड़ा रह गया, जहां तब था।

इमली के पेड़ पर 52 स्वतंत्रता सेनानियों को एक साथ फांसी

“यहां ये भी बता दूं कि फतेहपुर के बहादुरों ने स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और यह भी एक वजह थी कि अंग्रेजों ने इस ज़िले को अनदेखा कर रखा था। यहां के एक इमली के पेड़ पर 52 स्वतंत्रता सेनानियों को एक साथ फांसी दी गई थी और आज भी वह जगह 52 इमली के नाम से जानी जाती है। पुराने वक्त में फतेहपुर की खास बात यह थी कि वहां से ग्रैंड ट्रंक रोड (GT Road) गुजरती थी, जो दिल्ली से कलकत्ता (कोलकाता) को जोड़ती थी और डाक गाड़ी (हावड़ा कालका मेल) भी गुजरती थी, जो हावड़ा से चलकर दिल्ली होती हुई अंग्रेजों की समर कैपिटल शिमला को जोड़ती थी। यहीं उसके इंजन में यहां का मीठा पानी भरा जाता था। शिमला, दिल्ली, और कलकत्ता (कोलकाता) की सारी डाक इसी गाड़ी से आती जाती थी, इसलिए इसे डाक गाड़ी कहा जाता था।”

फतेहपुर में प्रतिभाओं की कमी नहीं, अच्छी पोजीशन में हैं कई लोग

“यहां फतेहपुर के बारे यह भी बताना बहुत जरूरी है कि यूपी का इंतेहाई पिछड़ा जिला होने के बावजूद भी यहां के लड़के-लड़कियां अच्छी नौकरियों में निकलते रहे हैं। देश के पहले भारतीय डीआईजी, रायबहादुर मानसिंह साहेब भी इसी शहर के ही थे। वह पहले भारतीय Imperial Police (IP) ऑफिसर थे, जो डीआईजी प्रमोट हुए। उस समय IP को इंडियन पुलिस भी कहते थे। इसके पहले सिर्फ गोरे (अंग्रेज) ही एसपी (SP) के ऊपर पहुंचते थे। IPS सेवा की शुरुआत, तो आजादी के बाद 1948 में हुई थी.”

“यहां फतेहपुर के बारे यह भी बताना बहुत जरूरी है कि यूपी का इंतेहाई पिछड़ा जिला होने के बावजूद यहां के लड़के-लड़कियां अच्छी नौकरियों में निकलते रहे हैं। देश के पहले भारतीय डीआईजी, रायबहादुर मानसिंह साहेब भी इसी शहर के ही थे। वह पहले भारतीय Imperial Police (IP) ऑफिसर थे, जो डीआईजी प्रमोट हुए। उस समय IP को इंडियन पुलिस भी कहते थे। इसके पहले सिर्फ गोरे यानी अंग्रेज ही एसपी (SP) के ऊपर पहुंचते थे। IPS सेवा की शुरुआत, तो आजादी के बाद 1948 में हुई थी. “

फतेहपुर फोरम बनने की कहानी

वो कहते हैं कि “सन् 2008 की बात है। मैं अपने दिल्ली के सिविल लाइन स्थित दफ्तर में बैठा हुआ था। फतेहपुर के दो मित्र शैलेन्द्र सिंह परिहार, जो तब दिल्ली प्रशासनिक सेवा में थे और तिवारी जी, जो बड़े व्यवसायी थे, मिलने आए। स्वाभाविक रूप से फतेहपुर की बात चली। बात ज़िले के पिछड़ेपन से होती हुई वहां से बाहर आए हुए लोगों तक पहुंची।”

“हम सब का ख्याल था कि फतेहपुर के बहुत से लोग तो बाहर निकलते हैं। ये लोग बाहर पहुंच कर खूब तरक्की भी करते हैं। प्रशासनिक सेवाओं से लेकर अच्छे-अच्छे व्यवसाय चलाते हैं, लेकिन फिर वापस फतेहपुर की ओर मुड़कर भी नहीं देखते हैं। इतना ही नहीं उन्हें यह तक बताने में शर्म आती है कि वो उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के रहने वाले हैं। कोई बताता है कि वह लखनऊ का है तो कोई इलाहाबाद का।”

बात चलते-चलते यह भी समझ में आया कि फतेहपुर से निकले लोग कौन हैं? कहां हैं? यह भी तो हमें मालूम नहीं। इसी से विचार बना कि क्यों न एक कोशिश की जाए और फतेहपुर के लोगों को जोड़ा जाए। इस प्रकार उसी दिन एक अनौपचारिक संगठन की स्थापना हुई और नाम दिया गया फतेहपुर फोरम (Fatehpur Forum)।

धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। आज इस पूर्णतः अनौपचारिक संगठन में 200 से अधिक फतेहपुरी हैं। फतेहपुर से निकले लोगों में, जिन्हें हम लोग जोड़ पाए, उनमें 4 डीजीपी लेवल के आइपीएस ऑफिसर हैं। चार आईएएस ऑफिसर, 11 आईआरएस ऑफिसर्स, दो ब्रिगेडियर, दो कर्नल, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के कई वकील, कई अच्छे व्यवसायी, वरिष्ठ डॉक्टर, इंजीनियर, सीनियर रेलवे अधिकारी और प्रगतिशील किसान हैं। इतना ही नहीं, इस फोरम में लेखक, पत्रकार, बहुत से बुद्धिजीवी और युवा पीढ़ी के लोग भी शामिल हैं.”

Back To Roots: फतेहपुर फोरम को लेकर हमारी मूलभूत अवधारणा यह थी कि हम लोग तो गांवों के सरकारी स्कूलों से पढ़कर यहां तक आ गए और जीवन में बहुत अच्छा कर रहे हैं, लेकिन जो लोग पीछे छूट गए, उनके लिए और अपने बेहद पिछड़े जिले के लिए हमें कुछ करना चाहिए। अपनी उस माटी के लिए जहां से हम निकले हैं, कुछ वापस करना चाहिए।

Fatehpur Forum
माटी से माटी कार्यक्रम ‘ॐ घाट’ फतेहपुर में इसरो के वैज्ञानिक सुमित कुमार की पुस्तक का विमोचन करते फोरम के अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव।

ॐ घाट भिटौरा और स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती

“फतेहपुर के ‘ॐ घाट भिटौरा’ के स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती इस फोरम के स्तंभ बने और पिछले 17 सालों से फोरम की सालाना मीटिंग, उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर ॐ घाट पर ही होती आई है। फोरम के सक्रिय साथियों में से कुछ को लेकर एक कार्यकारिणी बना ली गई। मैं (प्रदीप कुमार श्रीवास्तव) प्रेसिडेंट, डॉ महेश तिवारी और दयाशंकर रस्तोगी वाइस प्रेसिडेंट, शैलेन्द्र परिहार सेक्रेटरी, उत्तम तिवारी कोषाध्यक्ष और राजीव तिवारी उप सचिव बने।”

बड़ा सवाल, कहां से अंधेरा मिटाएं ?

“पिछड़े ज़िले में समस्याएं इतनी होती है कि समझ नहीं आता था कि कहां से शुरू करें, कहां खतम। स्कूल में मास्टर पढ़ाते नहीं। अस्पताल में डॉक्टर, मरीज नहीं देखते। शहर में सीवर लाइन थी ही नहीं। साफ-सफाई होती नहीं थी। बिजली भी बहुत कम आती थी, तो पानी भी टाइम-बे-टाइम आता था। वॉटर सप्लाई का पानी आता भी, तो गंदा आता था। वजह साफ थी कि पाइप पुराने थे। गल चुके थे। इत्यादि इत्यादि।”

“कहीं से तो शुरू करना ही था। हमने तय किया कि सबसे पहले अपने उस प्राइमरी स्कूल के लिए कुछ किया जाए, जहां से हमने पढ़ाई शुरू की थी। जब भी हम वापस गांव जाएं, अपने प्राइमरी स्कूल जरूर जाएं, देखें कि वहां पीने के पानी की टंकी है कि नहीं, न हो तो रखवाने का प्रयास करें। अधिकतर विद्यालयों में शौचालय या तो थे नहीं या उनमें पानी की व्यवस्था नहीं थी। सरकार के माध्यम से या स्वयं जो हो सके किया जाए। उस समय नेशनल बुक ट्रस्ट ने एक स्कीम चलाई थी, जिसके अंतर्गत कम लागत में बच्चों के लिए एक छोटी सी लाइब्रेरी स्कूल में बनाई जा सकती थी। इन विषयों में तमाम मेंबर्स ने काफी काम किया। कुछ स्कूलों में लाइब्रेरी बन गई। कई स्कूलों में सरकारी खर्चे से लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय भी बने।”

हुसैनगंज और बहुआ इलाके के गांवों में 60-70 साल पहले बड़ी-बड़ी झीलें थीं। इनमें से दो नदियां निकलती थी, जो आगे चलकर यमुना की ट्रिब्यूटरी बनती थीं। ये थीं ससुर खदेरी (Sasur Khaderi) एक व दो नदी। कालांतर में सामाजिक और सरकारी उपेक्षा के कारण झीलों के तटबंध टूट गए। जल संचयन (स्टोरेज) बंद हो गया और ये नदियां सूख गईं। फतेहपुर के पिछड़ेपन का एक फायदा भी हुआ। झीलों की जमीनों पर भू माफिया का कब्जा नहीं हुआ और आज भी वह खाली हैं।

इसी दौरान 2009 के उत्तरार्ध में स्वामी विज्ञानानंद ने इन क्षेत्रों का दौरा किया। फोरम के कुछ सदस्य जैसे राजेंद्र साहू भी सर्वे में स्वामी जी के साथ रहे। स्वामी जी के आध्यात्मिक प्रभाव में गांव वालों ने झील और नदी की जमीनों पर खेती बंद कर दी।

“इसी समय फतेहपुर फोरम ने भी इन दोनों नदियों को पुनर्जीवित करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी। तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन मेरे परिचित थे। उनके रुचि लेने पर फतेहपुर की उस समय की डीएम कंचन वर्मा ने ससुर खदेरी नदी के छोटे हिस्से की खुदाई और ठिठौरा झील की मरम्मत का काम शुरू किया। अगले साल की बारिश तक ठिठौरा झील में पानी भरने लग गया और 32 किलोमीटर लंबी नदी पुनर्जीवित हो गई। अब 60 किलोमीटर लंबी नदी पर फोरम काम कर रहा है। कंचन वर्मा के काम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यालय ‘PMO’ ने उत्कृष्ट कामों की सूची में रखा है।”

Fatehpur Forum

स्वामी विज्ञानानंद जी के साथ फतेहपुर फोरम के सदस्य प्रोग्राम से पूर्व विकास कार्यों पर चर्चा करते हुए।

नोन नदी का पुनर्जीवन

ससुर खदेरी नदी की तरह ही फोरम के उपाध्यक्ष डॉ एम सी तिवारी के अथक प्रयासों से वर्षों से सूखी नोन नदी में पानी बहने लगा। यह नोन नदी है, जो फतेहपुर के दक्षिण में जहानाबाद क्षेत्र में बहती है। पिछले दस-बारह वर्षों में डॉ तिवारी के उपक्रम और फतेहपुर फोरम जैसी सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से यह फिर से रिवाइव हुई है। नोन नदी जमुना की ट्रिब्यूटरी है। डॉ महेश तिवारी अतिरिक्त सर्वेयर जनरल सर्वे ऑफ इंडिया थे। स्वामी विज्ञानानंद जी और डॉ महेश तिवारी ने करीब 10 वर्ष पूर्व लोन नदी के सूखे प्रवाह क्षेत्र का दौरा किया था। उन्होंने पाया कि सिंचाई के लिए पर्याप्त नलकूप न होने के कारण फसलों को नुकसान हो रहा है. इतना ही नहीं उन्होंने पाया कि जहां नलकूप है भी, उसका पानी भारी होने के कारण बच्चों की सेहत खराब कर रहा है। डॉ महेश तिवारी ने लगातार एक दशक तक सरकार के हर स्तर पर पत्राचार करके अंततोगत्वा इतना दबाव बना दिया कि नोन नदी के प्रवाह क्षेत्र को ठीक किया गया। इसको लेकर छोटे-छोटे बांध बनाए गए और आज नोन नदी में साल भर पानी रहता है। खुशकिस्मती है कि किसान उसी पानी से फसलों को उगाते हैं। हैरान करने वाली बात ये है कि फतेहपुर फोरम के एक सदस्य के संकल्प से लोन नदी पुनर्जीवित हो गई।

फतेहपुर में फौज की भर्ती

गौर करें तो हरेक दो-तीन वर्षों में भारतीय फौज छोटे-बड़े शहरों में भर्ती कैंप लगाकर जवानों की भर्ती करती रहती है। इस दौरान फोरम के लोगों ने यह नोट किया कि बीते दो दशकों से फतेहपुर में कोई सेना भर्ती कैंप लगा ही नहीं था। फोरम वालों ने तह में जाकर देखा, तो पता चला कि यहां पहले कोई घटना घटी थी, जिसकी वजह से फतेहपुर जिला ब्लैकलिस्टेड हो गया था। फोरम ही के कर्नल विभय मानसिंह, जो तब लखनऊ में पोस्टेड थे। काफी भाग-दौड़ और लिखा-पढ़ी शुरू की। उप सचिव राजीव तिवारी के माध्यम से सेना मुख्यालय में प्रदीप श्रीवास्तव ने जनरल दयाल से संपर्क किया और उन्हें फोरम की एक छोटी सी मीटिंग में आमंत्रित किया।

फोरम की इस कोशिश के बाद जनरल साहेब बैठक में आए. उस दौरान वो फोरम के सदस्यों प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, शैलेन्द्र परिहार, राजीव तिवारी, डॉ महेश तिवारी और उत्तम तिवारी समेत कई सदस्यों से मिले। उस समय फोरम के विजन, उसके कार्यों को लेकर जनरल दयाल बहुत प्रभावित हुए।

बस, क्या था, 20 साल से अपनी बारी की बाट जोह रहे फतेहपुर की युवा पीढ़ी के लिए देश की सेवा करने का मौका मिल गया। जनरल ने फतेहपुर में आर्मी भर्ती की परमिशन दे दी। जिले के लिए यह एक बड़ा काम हुआ।

सेना भर्ती के लिए फतेहपुर में स्वामी जी ने एक बड़ा मैदान उपलब्ध कराया और उसे फौजी ट्रेनिंग के लिए दे दिया। फोरम के ही कर्नल विनोद तिवारी ने शुरू के कुछ वर्षों में स्वयं छुट्टी लेकर ट्रेनिंग की जिम्मेदारी ली।

इसी दौरान कर्नल मानसिंह ने प्रदीप श्रीवास्तव को युवाओं को ट्रेनिंग देने के लिए एक सीडी मुहैया कराई. इसको लेकर प्रदीप जी ने दूरदर्शिता दिखाई और इसकी सैकड़ों सीडी बनवा कर ग्राम पंचायतों में नौजवानों के बीच बंटवा दी। इसी तरह से फोरम के अन्य सदस्यों ने युवकों के दौड़ने के लिए जूतों और ड्रेस की व्यवस्था की। फिर क्या था, फतेहपुर सेना की भर्तियों में दौड़ने लगा। इस तरह से फोरम के सामूहित और अतुलनीय प्रयास से एक बहुत बड़ा काम संपन्न हुआ।

इसके बाद से जिले में फौज की भर्ती अब चलती रहती है। इसका नतीजे ये है कि बड़ी संख्या में फतेहपुर के लोग देश की रक्षा के लिए सरहदों पर तैनात हैं। इस तरह से ये बच्चे आज न सिर्फ देश के रक्षक है, बल्कि अपनों और परिवार के लिए एक बड़ा सहारा हैं. जिले के लोग अब गर्व से कहीं भी कहते हैं कि हमारे बच्चे सरहद पर देश की आन-बान-शान के लिए लड़ रहे हैं।

गाय नस्ल संवर्धन

ॐ घाट आश्रम भिटौरा में स्वामी विज्ञानानंद जी ने एक गोशाला खोली थी। इसके दो उद्देश्य थे; एक तो आश्रम में रहने वाले तमाम बेसहारा बुजुर्गों को और संस्कृत पढ़ने वाले बच्चों को दूध पीने को मिल जाए और दूसरा गायों की नस्लों का संवर्धन और सुधार। प्रदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि यह उस समय की बात है, जब वो चंडीगढ़ में डीजीपी थे और पंजाब में भी उनकी पकड़ मजबूत थी। वो कहते हैं कि स्वामी जी के आग्रह पर उन्होंने उनके खर्चे से 40 उन्नत जाति की साहीवाल गायों और उसी नस्ल के कुछ सांडों का प्रबंध किया और सीधे फतेहपुर भिजवाया. बगैर रुके वो कहते गए कि इसको लेकर आसपास के गांवों से किसानों को भी प्रोत्साहित किया गया कि वो अपनी गायों को आश्रम की गोशाला में लेकर आएं। इसका बड़ा असर पड़ा। उनकी गायों की नस्लें भी सुधर गईं. साहीवाल गायों की खरीद में फोरम के सदस्यों का भी वित्तीय योगदान रहा है। बता दें कि देश में पहली बार (NDRI करनाल में) कृत्रिम भैंस समरूपा पैदा करनेवाले डॉ एस एन मौर्य भी फतेहपुर फोरम के सदस्य हैं और इस साहीवाल प्रोजेक्ट से जुड़े रहे हैं। ये जिले के लिए गर्व की बात है।

इस दौरान प्रदीप जी ने फोरम के दूसरे उपाध्यक्ष दया शंकर रस्तोगी के योगदान को सराहते हुए कहाकि उन्होंने भी बड़ा अच्छा काम किया। रस्तोगी जी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में चीफ कमिश्नर पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने फतेहपुर से ॐ घाट उत्तरवाहिनी गंगा तक आने जाने के लिए एक बस का प्रबंध करा दिया। इससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों को शहर से आने जाने में सुविधा हो गई। इसी तरह से एयरफोर्स के ग्रुप कैप्टन टीपी श्रीवास्तव ने एक मारुति वैन शहर से घाट तक शवयात्रा के लिए मुहैया करा दी। “यह कुछ काम थे, जो फतेहपुर फोरम और जिले के लोगों की आध्यात्मिक, प्रशासनिक और सामाजिक ऊर्जा को जोड़कर किए गए। आगे संयुक्त प्रयास जारी हैं।

इतना ही नहीं चंडीगढ़ डीजीपी रहे और फतेहपुर फोरम के प्रदीप श्रीवास्तव अपनी बात को समेटते हुए कह गए कि बात सिर्फ फतेहपुर की नहीं हैं। ये अपने भारत की है। यहां की अधिकतर आबादी अब भी गांवों में बसती है। ऐसे में फतेहपुर से आगे भी हिंदुस्तान के बहुत से जिले पिछड़े हुए हैं। वहां भी बेहतर सोच वाले लोग हैं। अपने और अपने लोगों के जिले में काम करना चाहते हैं। बस, उन्हें दरकार है ‘फतेहपुर फोरम’ जैसी संस्था की, जो लोगों को जिले के विकास के लिए जोड़े। उन्हें आगे लाए और क्षेत्र का विकास करे। श्रीवास्तव जी कहते हैं कि हम लोग कोशिश कर रहे हैं। लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि भारत के और जिलों में कुछ ऐसा ही संगठन बने। लोग आएं और बरसों से पिछड़े पड़े हुए जिलों को विकास के रास्ते पर ले जाएं। एक लंबी सांस लेते हुए वो कहते हैं सब कुछ संभव है, अगर ठान लीजिए ! इसके लिए वो एक ‘मंत्र’ देते हुए कहते हैं कि गांवों का विकास ही असली भारत का विकास है। गांवों के पिछड़ेपन के अंधकार को खत्म करने का पहले एक संकल्प लीजिए। इसके बाद कदम बढ़ा दीजिए। लोग खुद जुड़ेंगे और आप लोगों को जोड़ते चलिए। पिछड़े गांवों, इलाकों और पिछड़े शहरों को जोड़िए। वहां हर वर्ग, हर पीढ़ी, महिला-पुरुष सबका साथ लीजिए। फिर देखिए, सब साथ चलेंगे और धीरे-धीरे सपनों का भारत हकीकत में बदल जाएगा.

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