“एक कचौड़ी, दो समोसा,
इन मर्दों का क्या भरोसा.
आजकल लड़कियों, महिलाओं और जेन जी में खुद की सुरक्षा, सम्मान को लेकर जबर्दस्त गुस्सा है …दिल्ली प्रोटेस्ट के दौरान ये गुस्सा भड़क गया है…
पुरुषों के खिलाफ लड़कियां और महिलाएं सड़कों पर उतर कर तरह-तरह का गाना गाकर पुरुषों पर तंज कस रही हैं. …समाज पर कड़े प्रहार कर रही हैं.
अब प्रदर्शन कर रही लड़कियों, महिलाओं और जेनजी में तेजी से वायरल हो रहे नारों को सुनते हैं.

“एक कचौड़ी, दो समोसा,
इन मर्दों का क्या भरोसा.
एक सुट्टा, दो चाय,
मर्द जात हाय-हाय !
ठंडे समोसे गर्म करो,
मर्द जात शर्म करो !
दो जलेबी एक राबड़ी
मर्दों की जात है गंदी
दो कबाब एक बिरयानी
हर मर्दों की अलग कहानी
ठंडी चाय गरम करो
मर्दों कुछ तो शर्म करो
नारी अपने आप की
नहीं किसी के बाप की
एक जीरा दो अजवाइन,
मर्द समाज डू रिजाइन
दो रोटी एक अचार,
इन मर्दों से रहो होशियार
गरम-गरम बड़ा पाव
मर्द जात सुधर जाओ
हमारी आजादी से इनको दर्द है…
वो सारे नामर्द हैं
नारी अपने आप की
नहीं किसी के बाप की
एक कड़ाही एक चम्मच,
अब नहीं पड़ेंगे झंझट में
जब शर्म नहीं है मर्दों में
औरत क्यों है पर्दो में
ये नारे हैं जिस पर प्रोटेस्टर नाच रहे हैं..गा रहे हैं … पुरुषों को धिक्कार रहे हैं…
‘एक कचौड़ी, दो समोसा… मर्द जात का क्या भरोसा…लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बना ये नारा पूरे देश में वायरल हो रहा है. सुर्खियां बटोर रहा है.
ऐसे में बड़ा सवाल बेटियों को ऐसा नारा लगाने की आखिर नौबत क्यों आई?
अब इस लाइन पर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह का भी दर्द झलका है…
एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा… के बोल पर उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर हमारी बेटियों को इस तरह का नारा क्यों लगाना पड़ा.

सोशल मीडिया और महिला प्रदर्शनों में ये नारा काफी चर्चित हो गया है…
ऐसे में ‘एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा’ के नारे पर समाज को आत्ममंथन की जरूरत है. इस पर गंभीर होने की जरूरत है.
इन लाइनों को सुनने पर ऐसा लगता है कि बेटियों को पुरुषों पर से भरोसा ही खत्म हो रहा है. इसलिए लड़कियों और महिलाओं को ये सवाल उठाना पड़ रहा है. आज इस बात पर पूरे समाज को विचार करना चाहिए.
ऐसे में कुछ उठाना जरूरी है…
क्या आपको इस नारे में मजाक ज्यादा दिखता है या महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता दिखाई देती है?
क्या आपको सच में लगता है कि आज महिलाओं का पुरुषों पर भरोसा कम हुआ है?
क्या ये नारा पूरे पुरुष समाज पर सवाल खड़ा करता है, या इसे कुछ पुरुषों के व्यवहार के खिलाफ विरोध के रूप में देखना चाहिए?
महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराने के लिए पुरुषों से आपकी सबसे बड़ी अपेक्षा क्या है?
क्या सिर्फ नारे लगाने से बदलाव आएगा, या परिवार, स्कूल, कॉलेज और समाज की सोच में भी बदलाव जरूरी है?
क्या आपको लगता है कि महिलाओं की आजादी और सुरक्षा के बीच समाज अब भी सही संतुलन नहीं बना पाया है?
यह नारा क्या कुछ पुरुषों के व्यवहार के खिलाफ महिलाओं के सामूहिक गुस्से की अभिव्यक्ति है?
मेरी समझ से यहां सवाल मर्द बनाम औरत का नहीं है. असली मुद्दे महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, सम्मान और भरोसे का है. इस पर घर परिवार,समाज के साथ सरकार को अपना काम करना होगा.
