US China Trade Deal : दो सुपर पॉवर चीन और अमेरिका ने चुपचाप टैरिफ डील कर ली और दुनिया कयास लगाती रह गई.
ब्रिक्स के बहाने लोग यूएस को अलग-थलग करने के सपने देखते रहे. ब्रिक्स समिट में दुनिया की आधी आबादी वाले मुल्कों ने नई दिल्ली में जिस चीन को टकटकी लगाकर देखा था, वो चुपचाप यूएस चला गया और गुपचुप डील कर ली.
डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की टैरिफ डील होने से भारत को जाने-अनजाने में झटका लगा है. अब उसे भरपूर तैयारी की ज़रूरत है… हालांकि उसकी मंजिल मुश्किल है…रास्ते पथरीले और कठिन हैं…फिर भी कोशिश करनी चाहिए…
सबको पता है कि अमेरिका और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों से व्यापारिक मोर्चे पर काफी खटपट चल रही थी. अब चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने खुलासा किया है कि दोनों देशों ने 30 अरब डॉलर के आयात पर टैरिफ को कम कर दिया है.
वॉशिंगटन में अमेरिकी प्रेसीडेंट ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय शिखर वार्ता ने भू-राजनीति और आर्थिक संतुलन को एक नई दिशा दी है.
दोनों देशों के बीच 30-30 अरब डॉलर के आयातित सामानों पर टैरिफ घटाने पर सहमति बनी है. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इस फैसले पर अब अमल का ऐलान किया है.
ऐसे में चीन-अमेरिका के बीच टैरिफ घटने से यूएस को कृषि उत्पाद, सी-फूड और मेडिकल डिवाइस जैसे अमेरिकी सामानों पर चीनी टैरिफ में राहत मिलेगी
वहीं अमेरिका, चीनी खिलौने और घरेलू उपकरणों पर टैरिफ कम करने पर सहमत हुआ है.
इतना ही नहीं वॉशिंगटन और बीजिंग ने अपने मौजूदा व्यापार समझौते यानी कि बुसान समझौते की अवधि को बढ़ाकर 10 जनवरी 2027 तक कर दिया है.
साथ ही दोनों देश Super Intelligence Dialogue शुरू करने पर भी राजी हुए हैं.
अब जानिए भारत पर इसका कैसे असर पड़ेगा.
सीधे समझिए… अब तक चीन और अमेरिका में चल रही खटपट का फायदा रणनीतिक रूप से भारत को मिल रहा था. ऐसे में दोनों महाशक्तियों के संबंध सुधरने से अमेरिका की ओर से भारत पर अपनी व्यापारिक और रक्षा शर्तों को मानने का दबाव बढ़ सकता है.
अमेरिकी बाजार में चाइनीज खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर गुड्स पर टैरिफ घटने से वे सस्ते हो जाएंगे.
इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय इंजीनियरिंग और कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के लिए कम्पीटिशन मुश्किल हो सकती है.
अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव कम होने से वैश्विक कंपनियों का चीन से बाहर भारत में मैन्युफैक्चरिंग शिफ्ट करने का रुझान धीमा पड़ सकता है.
हालांकि दोनों देश भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं. लेकिन वॉशिंगटन वार्ता में दोनों ने अपनी-अपनी घरेलू मज़बूरियों के कारण व्यावहारिक समझ बनाई है. अमेरिका को महंगाई नियंत्रित करने और सप्लाई चेन सुरक्षित करने हैं. इसके लिए उसे रेयर अर्थ की ज़रूरत है.
वहीं चीन अपने सुस्त पड़ते निर्यात को पटरी पर लाने के लिए अमेरिकी बाजार चाहता है.
दोनों देशों ने ईरान संकट, वैश्विक एनर्जी संकट खासकर होर्मुज जैसे जटिल मुद्दों को लेकर एक-दूसरे को नुकसान न पहुंचाने का फॉर्मूला अपना रखा है.
भारत के लिए सबसे बड़ी सीख यह है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता, केवल स्थाई हित होते हैं. ऐसे में भारत को अपने हितों के लिए काम करना चाहिए.
भारत को यह समझना होगा कि अमेरिका अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं के आगे किसी भी देश से हाथ मिला सकता है. इसलिए, भारत को अपने घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता, और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति को मज़बूत करना होगा, ताकि हाथ मिलाने के बावजूद दोनों महाशक्तियां भारत के हितों को नजरअंदाज न कर सकें.
