Ambedkar: आज के दौर में डॉ भीमराव अंबेडकर की पूछ बढ़ गई है. वहीं महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू… सरीखे महान नायक पीछे छूट गए हैं. ऐसा क्यों.
अब इसे समझते हैं. आज का भारत “अधिकार” की भाषा बोल रहा है, “त्याग” की नहीं.
आज का भारत सिस्टम में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है. सत्ता और संसाधनों पर उसकी नज़र है.
और अंबेडकर इन्हीं सब का प्रतिनिधित्व करते थे. वे समानता की बातें करते थे. आरक्षण, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा को लेकर आवाज़ बुलंद करते थे.
वहीं महात्मा गांधी नैतिकता, त्याग, आत्म शुद्धि पर जोर देते थे.
सुभाष चंद्र बोस का एजेंडा राष्ट्र, बलिदान का था.
वहीं जवाहर लाल नेहरू संस्थाओं, समाजवाद और वैज्ञानिक सोच की आवाज़ बुलंद करते थे.
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि आज का दौर त्याग नहीं, हिस्सेदारी मांगने का दौर है,
इसलिए अंबेडकर आज कहीं ज्यादा प्रासंगिक लगते हैं.
वहीं आज भी देखें तो अंबेडकर का एजेंडा अधूरा है…
उनके मुद्दे आज भी ज़िंदा हैं.
जाति आधारित भेदभाव बरक़रार है
सामाजिक बहिष्कार की कहानी खत्म नहीं हुई है
शिक्षा और नौकरियों में असमानता अपने भारत में.. आज भी है
न्यायपालिका और ब्यूरोक्रेसी में प्रतिनिधित्व एक जैसा नहीं है.
ऐसे में एक लाइन में कहें ..जब समस्या बनी रहती है,
तो उसका समाधान बताने वाला और बड़ा हो जाता है.
अंबेडकर इसी का हिस्सा हैं.
वहीं समाज की सोच में बदलाव आया है… गांधी-नेहरू को अब लोग “सिस्टम का हिस्सा” मानने लगे हैं.
साथ ही आज की राजनीति में यह नैरेटिव मज़बूत हुआ है कि
गांधी आदर्शवादी तो थे, लेकिन व्यावहारिक नहीं थे.
वहीं नेहरू एलीट, वंशवाद और सिस्टम का चेहरा थे.
सुभाष चंद्र बोस अखंड राष्ट्र की बात करने वाले लीडर थे.
इस तरह से देखें तो आज पहचान की पॉलिटिक्स का उभार है. आज राजनीति “विचार” से ज्यादा पहचान पर टिकी है.
ऐसे में जाति, समुदाय और प्रतिनिधित्व के लिए अंबेडकर पहचान की राजनीति के सबसे मजबूत प्रतीक हैं,
जबकि गांधी, नेहरू और सुभाष यहां नहीं ठहरते हैं..
आज अंबेडकर संविधान, आरक्षण, न्याय और प्रतिरोध के प्रतीक हैं, …
जबकि गांधी, नेहरू, बोस आज के संघर्ष के औज़ार नहीं हैं.
लेकिन ऐसा भी नहीं कि अंबेडकर की पूछ बढ़ने से गांधी, बोस या नेहरू छोटे हो गए…
बल्कि आज का भारत अंबेडकर की भाषा बोल रहा है
