आज बात करेंगे पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी की.
365 दिन यूं ही गुज़र गए मगर ज़ख्म अभी भरे नहीं…ऐसा लगता है कि ये मौत का मंज़र और चीखें साल भर पहले की नहीं बल्कि बीते हुए कल की ही हों…
22 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान चली गई. कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए. आज भी ये दर्द ना सिर्फ उन परिवारों को है, बल्कि पूरे देश को आज भी ये तकलीफ़ दे रही है.
आप को याद ही होगा अनंतनाग जिले के पहलगाम की बैसरन घाटी उस वक्त खून से लाल हो गई थी, जब पाकिस्तान से आए 3-5 आतंकियों ने 26 इंसानों की जान ले ली थी. एक साल पहले इस राक्षसों ने सैलानियों को धर्म पूछकर मारा था. इन आतंकियों ने लोगों की पहचान उनके धर्म के आधार पर की थी. और बेहद करीब से गोली मारी थी.
इस हमले में हाल ही में शादी के बंधन में बंधे लेफ्टीनेंट विनय नरवाल की भी हत्या कर दी गई. उसी विनय के शव के पास बैठी उनकी नई नवेली दुल्हन हिमांशी नरवाल की वो तस्वीर ने… पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था.
आतंकियों की या कायराना हरक़त उनके परिजनों की आंखों के सामने हुआ था. ये सीन सोचकर आज भी लोग सिहर उठते हैं, लोगों की आंखें नम हो जाती हैं. वहीं एक साल बीत जाने के बाद भी पीड़ित परिवारों की आंखों में आंसू हैं. अज़ीब सा सूनापन है और बेबसी है.
आज इस कायराना आतंकी हमले के 365 दिनों में वक्त की सुई काफी आगे निकल गई है. घाटी में पर्यटन फिर से गुलजार हो गया है और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के ज़रिए सीमा पार आतंकियों को करारा ज़वाब भी दिया गया.
लेकिन जिन परिवारों ने अपने घर का आंगन सूना होते देखा, उनके लिए आज भी वक्त उसी खौफनाक मोड़ पर ठहरा हुआ है.
पर्यटकों के बीच मिनी स्विट्जरलैंड के नाम से मशहूर पहलगाम में हुआ ये हमला सिर्फ एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि कश्मीर के पर्यटन, लोगों के विश्वास और इंसानियत पर गहरा वार था.
700 साल पहले कभी अमीर खुसरो ने कश्मीर की ख़ूबसूरती को जन्नत से नवाज़ा था. लेकिन बीते 4 दशकों में इस जन्नत ने बहुत उथल-पुथल देखी है. अब आतंक थमा है. ज़िंदगी पटरी पर लौट रही है. अमन चैन के बीच पयर्टन फिर से गुलजार हो रहा है.
लेकिन एक साल बाद भी सवाल वही है — क्या ऐसे हमले फिर न हों, इसकी कोई गारंटी है?”
चलते चलते कह कहते हैं कि अभी उन शहीद परिवारों का ज़ख्म अभी भरा नहीं है. इन शहीदों को नमन! श्रद्धांजलि
