Saturday, February 24, 2024
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Mahavir Prasad Dwivedi: आत्मसम्मान के आगे वैभव तुच्छ: ये कोई आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से सीखे

Mahavir Prasad Dwivedi: आत्मसम्मान के आगे धन, दौलत, संपदा सब कुछ मिथ्या है। ये बातें कोई आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से सीखे। इसी पर केंद्रित है आचार्य के आदर्शों से सुसज्जितत उनके कुछ पत्र। इन तथ्यों से रूबरू कराया है वरिष्ठ लेखक राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी ने-

उन दिनों आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सहायक स्टेशन-मास्टर थे। अत्यन्त चिन्ता में रहने लगे थे। एक दिन पत्नी ने पूछ ही लिया कि आप मुझसे छिपा रहे हैं? क्या बात है?

Mahavir Prasad Dwivedi: आचार्य बोले -“यह जो नया अंग्रेज अफसर आया है।  रातभर क्लबों में बिताता है।  मैं इसकी ड्यूटी बजाता हूं! इसने मेरी विनम्रता को मज़बूरी समझ लिया है। बुधवार को बोला कि सभी कर्मचारियों से कहो कि वे 8 बजे आ जाया करें! मैने कहाकि मैं तो आ जाऊंगा,  किन्तु बाकी कर्मचारियों से तो आप ही कहियेगा! यह बात बढ़ गयी।  वह बोला कि – मैं आपकी जगह दूसरा आदमी रख लूंगा। वह मेरे माध्यम से कर्मचारियों पर जुल्म करना चाहता है!

आचार्य की पत्नी ने कहाकि – आपने तुरन्त इस्तीफा लिखकर उसके मुंह पर क्यों नहीं दे मारा? आचार्य बोले – मैंने यही किया, देवी! अच्छा तो यह चिन्ता है! पत्नी ने कहा। नहीं देवी! समस्या इसके बाद की है!

क्या? देवी!, अब वह कहता है कि मैं इस्तीफा वापस ले लूं! मैं क्या करूं? पत्नी ने कहाकि  इस्तीफा और वापस?  कोई थूककर चाटता है क्या? आचार्य बोले – किन्तु यह शान-शौकत की जिन्दगी,  सरकारी-नौकरी,  यह रुतबा!

पत्नी ने कहाकि – स्वाभिमान की सूखी रोटी तो मिलेगी,  तुम 8 आना रोज भी कमा लाओगे तो मै उसी में घर चला लूंगी! आत्मसम्मान के आगे यह वैभव तुच्छ है!

मगर आज जब शब्द और आचरण का रिश्ता बदल गया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के जीवन की यह घटना प्रासंगिक है कि द्विवेदी जैसे युग किताबों को लिखने से नहीं, तपोमय- आचरण से बनते हैं।

Mahavir Prasad Dwivedi: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी नये लेखकों से कहते थे कि- कोई भी रचना लिखकर छपने के लिये तुरन्त नहीं भेजनी चाहिये। धैर्य रखो,  उसे कुछ दिन अपने पास पड़े रहने दो। तुम देखोगे कि तुम स्वयं ही अपनी रचनाओं के अच्छे संशोधक बन गये हो।

आज ऐसे उदाहरणों को अधिक ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी,  जिसमें कि व्यास की आसंदी पर बैठे व्यक्ति ने अपने अधिकार और पैनी कलम का उपयोग आसपास के आम-नीम- जामुन-पीपल-बरगद के बिरवों को काटने या उखाड़ने के लिए किया है, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि एरंड [अंडी] के पेड़ ही महावृक्ष होते हैं। आगे का साहित्य-इतिहास इसका भी विश्लेषण करेगा।

लेकिन आज जो सत्य हमारे सामने है, वह यह है कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने नये कवि और लेखकों बाग-बगीचे ही लगा दिये थे।

Mahavir Prasad Dwivedi: दलित साहित्य की ओर सबसे पहले द्विवेदी जी का ध्यान गया और उन्होंने हीराडोम की भोजपुरी – कविता  सरस्वती पत्रिका [सितंबर 1914] में कविता छापी थी, वह ऐतिहासिक महत्व की हैं।

[1]

हमनी के रात-दिन दुखवा भोगत बानी,

हमनी के साहब से मिनती सुनाइब।

हमनी के दुख भगवनओं न देखत जे,

हमनी के कवले कलेसबा उठाइब।

पदरी- साहब के कचहरी में जाइबजां ,

बे-धरम हो के रंगरेज बन जाइब।

हाय राम धरम न छोड़त बनत बानी,

बेधरम हो के कैसे मुखबा दिखाइब?

[2]

हमनी के रात-दिन मेहनत करीले जां,

दुइगो रुपैया दर माहिब में पाइब।

ठकुरे के सुखसेत घर में सुतल बानी ,

हमनी के जोत-जोत खेतिया कमाइब।

हाकिम के लसकर उतरल बानी, जेत,

उहवां बेगरिया में पकरल जाइब।

मुंह बान्हि ऐसन नौकरिया करत बानी,

ई कुल खबर सरकार के सुनाइब।

[3]

बभने के लेखे हम भिखिया न मांगबजां,

ठकुरे के लेखे नहिं लउरा चलाइब।

सहुआ के लेखे हम डांडी न मारबजां,

अहिरा के लेखे नहिं गैया चराइब।

भटबा के लेखे न कबित्त हम जोरबजां,

पगडी न बांन्हि के कचहरी में जाइब।

अपने पसीनबा कै पैसा कमाइबजां,

घर भर मिलजुल बांटि-बांटि खाइब।

[4]

हड़बा मसुइया के देहिया हे इमनी के,

ओकरे के देहियां बभनबा कै बानी।

ओकरा कै घर-घर पुजबा होखत बाजे,

सगरे हलकबा भइलें जजमानी।

हमनी के इनरा के निगचे न जाइलेजां,

पांके में से भरि-भरि पिअतानी पानी।

पनही से पिटि-पिटि हाथ-गोड तुरि दैलें,

हमनी के एतनी काहे हलकानी।

  • हीराडोम

इसी तरह से बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखी महावीर प्रसाद द्विवेदी की चिट्ठी पढ़िए

(बनारसी दास चतुर्वेदी के नाम लिखे उनके पत्र से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के आचरण और व्यवहार को समझा जा सकता है।)

दौलतपुर, रायबरेली

22-10-1928

प्रिय चतुर्वेदीजी, नमोनम:।

Mahavir Prasad Dwivedi: 19 अक्तूबर की चिट्ठी मिली। उसकी लंबाई को देखकर ही डर गया। यह सोचकर कि मुझे इससे भी लंबा जवाब लिखना पड़ेगा,  मैं घबरा सा गया। खैर,  जो भोग-भाग्य में बदा है, उसे भोगना ही पड़ेगा। दीर्घायुर्भूयात्‌।

“`लोकोक्ति कोश वाले खत्रीजी [शायद दामोदर दास] को यह चिट्ठी दिखाइये और उनसे कहिये कि मैं उनसे,  मुर्शिदाबाद वाले नवाबी जगत्सेठों से तथा कारनेगी और राकफेलर से भी अधिक अमीर हूँ। अमीर किसे कहते हैं,  शायद वे नहीं जानते। शंकराचार्य जानते हैं।  वे कहते हैं कि जो जितना अधिक संतोषशील है। वह उतना ही अधिक अमीर है और जो जितना तृष्णालु है, वह उतना ही दरिद्र है। मैं तो दुनिया-भर के अमीरों को, लक्षाधीशों को ही नहीं, कोट्यधीशों को भी अपने सामने तिनका निस्पृहस्य तृणं जगत्‌  समझता हूँ।

ये लोग दूसरों के मालमत्ते की मापतोल अपने मानदंड से करते हैं।  यह कभी नहीं सोचते कि उनसे पूछें कि तुम्हें किसी चीज की कमी तो नहीं है?  और यदि हो तो उसे दूर करने की कोशिश करें!

Mahavir Prasad Dwivedi: 17 बरस की उम्र से मैंने रेलवे मे मुलाजिमत शुरू की थी।  मुझे 200 रुपये मिलते थे। 18 बरस तक सरस्वती का काम किया। छोड़ने के वक्त कुल 150 रुपए मिलते थे। कभी एक पैसा भी किसी से हराम का नहीं लिया। मेरा रहन-सहन, घर-द्वार सब आपका देखा हुआ है। कानपुर का कुटीर भी आप देख चुके हैं। इस तरह रहकर जो कुछ बचाया, वह खैरात कर दिया।

कानपुर का पुस्तक-संग्रह नागरी-प्रचारिणी को दे चुका हूँ।  अब जो मेरे पास बचा है, उसे हिन्दू-विश्वविद्यालय को देने के लिये लिखा-पढ़ी कर रहा हूँ।

यह सब लिख दिया है। डर यह है कि मेरे मरने के बाद कहीं आप ये बातें छपवाने न दौड़ पड़ें। मैं इसकी ज़रूरत नहीं समझता।

आपका,

महावीर प्रसाद द्विवेदी

राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी, वरिष्ठ लेखक ]

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