आज हम बात करेंगे दहेज़ को लेकर देश में हो रहे डॉवरी डेथ की…दहेज़ हत्याओं की…
NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में औसतन हरेक 90 मिनट में एक महिला दहेज की बलि चढ़ रही है.
इस तरह से देखें तो औसतन प्रतिदिन 16 महिलाएं दहेज की वज़ह से मारी जा रही हैं. इस तरह से अपने भारत में हरेक साल तकरीबन 6,000 दहेज़ हत्याएं हो रही हैं.
एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार, हालिया वर्षों में हर साल दहेज प्रताड़ना और हत्या के 15,000 से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं.
इनमें से लगभग 6,000 मामले सीधे तौर पर दहेज हत्या के होते है.
हैरानी की बात तो ये है कि पूरे भारत में दहेज हत्या के 50% मामले तो अकेले यूपी और बिहार में दर्ज होते हैं. इसके बाद इस काली सूची में मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल का नाम आता है.
बड़े शहरों की बात करें तो दिल्ली दहेज हत्या के मामले में टॉप पर है. कानपुर दूसरे, पटना तीसरे और बंगलुरू चौथे पायदान पर है.
वैसे तो दहेज को लेकर अपने भारत में कानूनी प्रावधान सख्त हैं. फिर भी दहेज हत्याएं और उत्पीड़न रुक नहीं रहा है.
भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के तहत दहेज़ से जुड़े मामलों में सज़ा का प्रावधान है.
शादी के 7 वर्ष के भीतर ही महिला की असामान्य परिस्थितियों में हो जाती है.
महिला की मृत्यु जलने, शारीरिक चोट या किसी अन्य अप्राकृतिक कारण से हुई हो.
यह प्रूफ हो जाए कि मृत्यु से कुछ समय पहले उसके पति या ससुराल वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर उसके साथ क्रूरता की गई थी या उसे प्रताड़ित किया गया था.
इसके साथ ही ये साबित हो जाता है कि महिला की मौत के पीछे उसका पति था या उसके रिश्तेदारों द्वारा दहेज प्रताड़ना की गई थी, तो भी ‘दहेज हत्या’ मानी जाती है.
भारतीय न्याय संहिता के अनुसार दहेज हत्या मामले में कम से कम 7 साल की सज़ा का प्रावधान है. इतना ही नहीं इस दंड को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है.
बीएनएस की धारा 85 के तहत दहेज के लिए महिला के साथ मानसिक या शारीरिक क्रूरता करने पर पति और रिश्तेदारों के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है.
गौर करें तो दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत भारत में दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध हैं.
