Saturday, February 24, 2024
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Rameshwar Pandey Kaka: श्रद्धांजलि! …दिल में बसे हैं रामेश्वर पाण्डेय काका

Rameshwar Pandey Kaka: जानेमाने पत्रकार और समाजसेवी रामेश्वर पाण्डेय काका। ये सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि परंपरा के वाहक थे। काका नाम से मशहूर, दिलों पर राज करने वाले रामेश्वर पाण्डेय उर्फ काका से जो भी मिला, वो भूल नहीं सकता। दैनिक जागरण से लेकर अमर उजाला तक, यूपी से पंजाब तक उन्होंने पत्रकारिता की जो पौध तराशी थी। वो आज उनको नमन कर रही है।

Rameshwar Pandey Kaka: गोरखपुर, लखनऊ, मेरठ, जालंधर और न जाने कहां-कहां पत्रकारिता की सेवा करते-करते ये सूरज कहीं गुम हो गया। रामेश्वर पाण्डेय काका के असमय निधन से मीडिया जगत को एक बड़ी क्षति हुई है। जिसकी भरपाई करना मुश्किल है। उनके निधन पर मीडिया जगत के लोग, समाजसेवी, कॉमरेड, आमजन के साथ यूपी की सीएम योगी आदित्य नाथ, डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना समेत तमाम राजनेताओं ने शोक जताया है। साथ ही शोक संतप्त परिजनों को इस दुख को सहने की शक्ति दे।

नीशीथ जोशी के फेसबुक वॉल से

Rameshwar Pandey Kaka: अरे यह तो बहुत ही दुखद समाचार है। रामेश्वर पांडेय का हमारा परिचय 1985 का है। जब वे शाने सहारे के बंद होने के बाद माया पत्रिका से जुड़े थे। उनकी कॉपी राइटिंग गजब थी। उसने भी यह कला हमने सीखी। माया पत्रिका में इलाहाबाद में थे वे। फिर अमर उजाला जालंधर में हमारे संपादक रहे। हमारे पिता रमेश जोशी के प्रिय लोगों में थे। लुधियाना में जब पिता श्री ने शरीर त्याग किया तो उन्होंने बहुत से लोगों मिलवाया। अब हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। आज हम भी यही महसूस कर रहे हैं पांडेय जी के जाने से। हमारी जब भी बात होती थी बहुत प्रेम मिलता था। हमारा शत-शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर और महान गुरुजनों से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को अपने हृदय में स्थान दें और परिजनों को शक्ति।

राजू मिश्र की फेसबुक वॉल से

Rameshwar Pandey Kaka: अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई प्रमुख अख़बारों में विभिन्न पदों पर रहे देश के जाने माने पत्रकार काका के उपनाम से ख्यात रामेश्वर पांडेय का आज निधन हो गया। उनके साथ बहुत सारी यादें जुड़ी हैं। बहुत याद आएंगे काका। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और परिवार को दुःख सहने की शक्ति दें।

कुमार पीयूष की टिप्पणी

काका के साथ बीती तमाम यादें सम्मुख हैं… काका के साथ रहना, खाना-पीना… किसी भी विषय पर जोरदार बहस की स्वतंत्रता… कार्यस्थल का माहौल पारिवारिक प्रोफेशनल माहौल बनाये रखना… अपनी कोर टीम को शोषण से बचाये रखना… असाधारण व असीमित कार्यक्षमता (work alcohlic)… बहुत कुछ याद आ रहा है… काका तमाम खूबियों से ‘काका’ कहलाते थे।

काका मेरे पहले सम्पादक थे,  दैनिक जागरण (मेरठ) में,  फिर काका के साथ अमर उजाला (मेरठ) गया… विनम्र श्रद्धांजलि…

बृजेश शुक्ला के फेसबुक से

काका का निधन हिला गया। फोन पर उनसे कभी-कभी बातचीत होती थी। विशेष रूप से चुनाव के समय। उनका आकलन सच के बहुत करीब होता था। राजनीतिक विश्लेषण मे जो सत्य के नजदीक होते थे उनमें हमारे काका भी थे। काका बहुत याद आएंगे। अभी एक सप्ताह पहले ही राज बहादुर चले गए। आज काका। पत्रकरिता क्षेत्र में उनका जाना ऐसी रिक्तता पैदा कर गया, जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती। शत-शत नमन और श्रद्धांजलि।

यशोदा श्रीवास्तव के फेसबुक से

काका नामधारी देश के जाने-माने पत्रकार रामेश्वर पांडेय के निधन की सूचना से स्तब्ध हूं। करीब तीन महीने पहले वायस आफ लखनऊ के उनके कार्यालय में मुलाकात हुई थी। उन्होंने अपने अखबार में भी नेपाल पर लिखने को कहा था। मुलाकात तो दैनिक जागरण गोरखपुर के समय से रही है। शान ए सहारा साप्ताहिक समाचार पत्र में उनके साथ कार्य करने का मौका मिला। अपने कनिष्ठों के प्रति सदैव प्रेम भाव रखने वाले काका हेड मास्टर की तरह सिखाने पढ़ाने में भी रुचि रखते थे।

काका के साथ बहुत सारी यादें हैं। अचानक उनके निधन की खबर से व्यथित हूं। ईश्वर उनको अपने श्री चरणों में जगह दे।। ऊं शांति ऊं।।।

अमिताभ अग्निहोत्री के फेसबुक से

अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई प्रमुख समाचार पत्रों में संपादक रहे देश के ख्यातनाम पत्रकार रामेश्वर पांडेय का आज निधन हो गया–उनके साथ मित्रता का एक लंबा काल खंड रहा —  ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और परिवार को दुःख सहने की शक्ति दें—नमन !!

अरविंद शर्मा के फेसबुक से

काका आपको कौन भूल सकता है

हिंदी पत्रकारिता के प्रभावपूर्ण हस्ताक्षर और दैनिक जागरण एवं अमर उजाला जैसे श्रेष्ठ अखबारों के संपादक रहे रामेश्वर पांडेय आज स्वर्गीय हो गए। पत्रकारिता में हम सब उन्हें काका नाम से ही जानते हैं। उनका काका नाम क्यों और कैसे पड़ा होगा, मुझे नहीं पता, लेकिन नए या मुश्किलों से घिरे पत्रकारों के लिए वह सचमुच में काका की तरह ही खड़े रहते थे। मुझे गर्व है कि कैरियर की शुरुआत में ही उनके नेतृत्व में मुझे अमर उजाला मेरठ और जालंधर में काम करने का मौका मिला। मेरे जैसे अनगढ़ बच्चे को उन्होंने अपने अनुशासन एवं स्नेह के जरिए इस लायक बनाया कि आज राष्ट्रीय राजधानी में खड़ा और बड़ा होने का प्रयास कर रहा हूं। काका के व्यक्तित्व में ही अनुशासन था। ऐसा कड़क अनुशासन, जो बिना चीखे-चिल्लाए ही जूनियरों पर प्रभावी हो जाता था। मुझे याद नहीं कि काका ने कभी आफिस में किसी जूनियर पर अपना गुस्सा उतारा हो या गलती पर किसी को डांट लगाई हो। कभी गलती हो जाने पर मुझे तो हंसते-मुस्कुराते काका को देखकर भी पसीने छूट जाते थे। मगर काका अपने केबिन में बुलाते। प्यार से इधर-उधर की बातें करते और फिर गलती का कारण पूछते और अंत में समझाते कि इस तरह की गलतियों से कैसे बचा जा सकता था। और हां…। केबिन से निकलते वक्त यह कहना भी नहीं भूलते कि मैंने उस दिन के अखबार में और क्या-क्या अच्छा किया है। बहुत सारी बातें हैं काका। लिखने लग जाऊं तो रोने लग जाऊंगा। इसलिए क्षमा कीजिए। मैंने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के साथ कभी काम नहीं किया, किंतु मेरे जमाने के बड़े पत्रकारों में काका भी किसी से थोड़ा भी कम नहीं थे। आप हमेशा याद रहेंगे काका।

राघवेंद्र दुबे के फेसबुक वॉल से

तो झगड़ा भी खत्म कहां हुआ

कई बार काका से लड़ – झगड़ कर, उन पर लिखता भी रहा। काका पर खूब लिखा है,  जिसे अपना चश्मा नाक पर थोड़ा और सरका कर, मुदित मन उन्होंने पढ़ा भी और मुझे लेकर थोड़ा और ‘ कन्फ्यूज’  ही हुए – ‘ क्या गजब लिखता है यह शख्स, अभी कल ही लड़ कर गया और आज यह लिख मारा ..’। काका से जितनी मोहब्बत रही, उतनी ही लड़ाई। हम दोनों इस परिधि से बाहर किस द्वीप पर मिलते थे, आज खुद से ही पूछ रहा हूं। मेरे लिखे पर यह टिप्पणी खुद काका की है। काका बता रहे हैं अपने बारे में।

हम विषपायी लोग

राघवेन्द्र दुबे ‘ भाऊ ‘  ने यादों के तार छेड़ दिये हैं। मन अतीत की तरफ़ लौटने लगा है। बात उन्नीस सौ बहत्तर-तिहत्तर की है। हम लोग – मैं, जय प्रकाश शाही और देवेन्द्र सिंह,  किसान इंटर कालेज, गगहा (गोरखपुर) में पढ़ रहे थे। नक्सलवादी आंदोलन का ताप हम लोगों तक पहुंच गया था।

गुलशन नंदा, रानू, इब्ने शफ़ी बीए से होते हुए पता नहीं कब मैक्सिम गोर्की की ‘ मां’ , आस्त्रोवस्की की ‘अग्निदीक्षा’ हाथ में आ गयी। हम लोगों के लिए दुनिया बस बदलने वाली थी। एक मानवीय दुनिया। हम लोगों ने एक साहित्यिक मंच बनाया – विषपायी।

हम विषपायी लोग अपनी धुन में रमे थे, उसी समय नक्सली आंदोलन के उस समय के बड़े नेता गुरु प्रसाद त्रिपाठी से मुलाक़ात हुई और मेरे हाथ में ‘लोकयुद्ध ‘ आ गया। उसके बाद से डा. लाल बहादुर वर्मा, तड़ित कुमार, विनय श्रीकर से मुलाक़ातें, जेपी आंदोलन का दौर, फिर आरएसपीआई (एमएल) तक की यात्रा,  इन सबकी चर्चा कभी बाद में। फिलहाल मित्रों के आदेश पर उस दौर में लिखी कुछ कविताएं। बहुत मुश्किल से कुछ ही तलाश पाया हूं। जो धूल लगी ‘अग्निदीक्षा’  की गोद में छिपी हुई थीं।

दोस्त,

फ़र्क़ है / बहुत फ़र्क़ है दोस्त

मेरे और तुम्हारे बीच सचमुच बहुत फ़र्क़ है/

तुम/

आदमी की तरह रहते हो / और

जानवर की तरह सोचते हो /

मैं / जानवर की तरह रहता हूं /

और आदमी की तरह सोचता

तुम / सभ्य हो /

मैं / असभ्य हूं /

तुम बहुत संवेदनशील हो मेरे दोस्त /

संवेदनाओं की सूक्ष्म गतियों की तुम्हें पकड़ है /

तुम्हारा मन बड़ा कोमल है /

साथी / बहुत ललचाता है /

बड़े जतन से संवारा गया तुम्हारा ड्राइंगरूम /

सचमुच मुझे बहुत ललचाता है /

दीवारों पर टंगी तस्वीरों ने जब भी देखा है /

मेरी ओर अपलक / एकटक / तब तब /

मुझमें आदमी की तरह रहने की चाह पली है /

कुलबुलाने लगा है मेरे भीतर /

एक नन्हा सा सपना /

लेकिन दोस्त / बड़ा डर लगता है /

यक़ीन मानो / विषकन्या के सौन्दर्य की तरह /

शातिर है तुम्हारा यह ड्राइंग रूम /

यक़ीन करो साथी / सच

कह रहा हूं / तुम्हारे ड्राइंग रूम की ख़ूबसूरत दीवारों ने /

निगल लिया मेरे प्यारे से नन्हे बच्चे को /

बड़े प्यार से निहारा था / मेरे बच्चे को

इन दीवारों ने / वह बेसुध सा /

दीवारों की पेट में समा गया /

मैं रोया था / फफक फफक कर

रोया था साथी / तब तुमने रख दिया था /

अपना सुह्रद हाथ मेरे माथे पर /

बहुत देर तक सहलाते रहे थे मुझे /

पुचकारते रह थे मुझे / लेकिन एक दिन /

उस दिन / जब उसके साथ खेलते हुए /

तुम बहुत ख़ुश थे / मैंने पहचाना था / वह

मेरा ही बच्चा था / उसके गले में बंधा था ख़ूबसूरत पट्टा /

तुम अपने लान में खिला रहे थे उसे /

बिस्कुट के टुकड़े / बहुत ख़ुश था वह /

तुम्हारे पांवो में लोट रहा था /

मैंने देखा / उसके हाथों में उग आये थे तेज़ नाख़ून /

सच तो यह है /

उसके हाथ पांव हो गये थे।

– रामेश्वर पाण्डेय

काका के व्यक्तित्व को लेकर अनिल कुमार पाण्डेय ने कहाकि कि उनके लिए कोई छोटा नहीं था। चाहे वो अखबार का पेस्टर रहा हो, कंपोजिटर रहा हो, रिपोर्टर या सब एडिटर रहा हो, सबसे वो अपनापन रखते थे। शत-शत नमन!

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