जिस जज के फैसले से सरकारें हिल जाती हैं,
क्या उसे हटाना भी उतना ही आसान होता है?”
हम बात करे हैं..
कैशकांड: बदनामी, महाभियोग और
जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे की…
बीते साल होली की रात जस्टिस वर्मा के लुटियंस दिल्ली स्थित घर में आग लगी थी…आग बुझाने के दौरान कथित रूप से जले-अधजले नोटों के बंडल मिले थे…
नोटों के बंडल कहां से आए थे…इसी को लेकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चल रही थी. इस बीच उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को इस्तीफा सौंप दिया.
इस्तीफ़ा सौंपने के बाद जस्टिस वर्मा ने अपने पत्र में लिखा कि, उनके बेदाग करियर में उनके खिलाफ एक बदनामी भरा अभियान चलाया जा रहा है.
अब जब जस्टिस वर्मा महाभियोग की प्रक्रिया के दौरान ही रिज़ाइन कर चुके हैं तो जानते हैं कि भारत में जजों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया क्या है…
भारत में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग तभी चलता है, जब उस पर
सिद्ध दुर्व्यवहार साबित हो चुका हो.. या “असमर्थता के गंभीर आरोप लगे हों.
जजों के खिलाफ महाभियोग से पहले महाभियोग प्रस्ताव आता है, जिसे लोकसभा या
राज्यसभा में कहीं भी पेश किया जा सकता है..
इसके लिए लोकसभा में मिनिमम 100 सांसद और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन ज़रूरी होता है.
उसके बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति
एक तीन सदस्यीय जांच समिति बनाते हैं. यह समिति आरोपों की जांच करती है.
अगर जांच रिपोर्ट में आरोप सिद्ध नहीं होते हैं, तो प्रक्रिया समाप्त हो जाती है. और आरोप सिद्ध होने पर महाभियोग चलता है.
उसके बाद जिस संसद के दोनों सदनों में वोटिंग होती है. दोनों सदनों से प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति…जज को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं.
जस्टिस वर्मा से पहले कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन और सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस पी.डी. दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग चला था. इन दोनों जजों ने महाभियोग के दौरान रिज़ाइन कर दिया था. अब जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम भी इस सूची में दर्ज हो गया है.
वहीं, गौर करें तो इस्तीफा देने से महाभियोग की प्रक्रिया स्वत: ही रद्द हो जाती है.
