“I Love My Daughter ”मेरठ की धरती से एक बार फिर चिंगारी उठी है…1857 को यहीं से अंग्रेजी हुक़ूमत के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजा था. आज इसी क्रांति की माटी से बेटियों, बहुओं और बहनों के लिए एक बड़ा संदेश गया है…
यह संदेश उस बात के लिए है, कि जिसमें कहा जाता था कि बेटियां पराई होती हैं…वो बोझ होती हैं…ससुराल से तो उनकी …मय्यत आती है…
आज एक बड़ा संदेश समाज के लिए हैं…बेटियों के लिए है…इसकी शुरुआत भारत की बेटी ने मेरठ से उठाई है…यहां एक बेटी ने ससुरालियों के जुल्मो-सितम से तंग आकर… सालों तक लंबी लड़ाई लड़ी और अब तलाक लेकर जमाने के लिए एक मशाल बन गई है.
हम बात कर रहे हैं मेरठ की प्रणिता शर्मा की …हां, वही प्रणिता जिसे ससुरालियों के उत्पीड़न से आजादी मिली है.. तलाक हुआ है.
इस पर प्रणिता के परिवार का कहना है बेटी का आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य किसी भी रिश्ते से ज्यादा अहम था. यही वजह है कि “तलाक” को कलंक नहीं …नई शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है…
इतना ही नहीं फैमिली कोर्ट से तलाक की डिक्री मिलते ही कोर्ट परिसर से ही ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई पड़ी, जुलूस निकला. मिठाइयां बटीं …साथ ही समाज को एक सीधा संदेश गया…बेटियां बोझ नहीं होतीं..बेटियां पराया नहीं होती.
कहते हैं कि रिश्ता कितना भी ज़हर क्यों न बन जाए, उस दलदल से निकलना आसान नहीं होता…इसके लिए बड़ी हिम्मत चाहिए..मां-बाप और परिजनों की ताक़त चाहिए.
आज प्रणिता आज़ाद है…अतीत के ज़ख्मों से उबर रही है…और मासूम बेटे के साथ भविष्य का तानाबाना बुन रही है…
वहीं उसके पापा ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा कहते हैं कि उन्होंने मेजर दामाद से न तो कोई सामान वापस लिया और न ही गुजारा भत्ता मांगा. उन्होंने कहा, “मुझे अपनी बेटी की खुशियां और उसका आत्मसम्मान चाहिए था, जो मुझे मिल गया है.
ये मामला सिर्फ तलाक का नहीं,
सोच के तलाक का भी है—
उस सोच से,
जो आज भी महिलाओं को
एक नाखुश रिश्तों में बांधकर रखती है..
आज मेरठ से उठी ये आवाज़
शायद पूरे समाज से पूछ रही है—
क्या अब वक्त बेटियों को घुट-घुटकर मरने न दिया जाए..
चलते-चलते ये बात बताना ज़रूरी है…रिश्ते समझौते से चलते हैं…शादी एक पवित्र बंधन है…इससे समाज, घर-परिवार बच्चे सब जुड़े रहते हैं…इसका गहरा असर पड़ता है. ऐसे में तलाक़ लेने से पहले बार-बार सोचें..क्योंकि तलाक कोई फैशन नहीं है…
