Pradeep Srivastava: “मेरा नौकरी के दौरान और नौकरी छोड़ने के बाद भी एक प्रयास यह रहा कि मैं कुछ ऐसे काम करूं, जिससे जो इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन के लोग हैं, जो समाज के आखिरी पायदान पर खड़े है, उनके लिए कुछ ऐसा कर सकूं, जिससे न सिर्फ उनका बल्कि उनके साथ-साथ समाज का फायदा हो।“

गली क्रिकेट का असर! “मैं 2010 के प्रारंभ से 2012 के अंत तक, डीजीपी चंडीगढ़ तैनात था। उस समय तक पंजाब में नशे की लत बहुत बढ़ गई थी, चंडीगढ़ भी उससे अछूता नहीं था। तमाम ड्रग्स अफगानिस्तान, पाकिस्तान से होती हुई पंजाब, हिमाचल, चंडीगढ़ के रास्ते दिल्ली पहुंचती थी और वहां से आगे उनका एक सप्लाई नेटवर्क था। मैंने यह नोट किया था की चंडीगढ़ में भी जो कम उम्र के बच्चे हैं, उनको भी नशे की आदत पड़ रही है।”
“यह नशा समाज के दो तबको में विशेष था; एक तो बहुत अमीर तबका जो की पार्टियों में महंगे नशे का इस्तेमाल करता था और दूसरा गरीब तबका जो सस्ती गोलियां और सस्ते नशे का शिकार हो रहा था। मुझे लगा कि अगर हम इन नौजवानों को काम के बाद कोई ऐसे खेलकूद में लगा सकें, जिससे उनकी ऊर्जा व्यय हो और वह खाली नहीं रहें तो नशे से शायद बच सके। इनमें अधिकतर वह लोग थे जो या तो स्कूल ड्रॉप आउट थे. रैग पिकर्स थे या और कोई छोटा मोटा काम करते थे, लेकिन अधिकतर समय खाली रहते थे।”
“हम सभी जानते हैं की क्रिकेट पूरे देश में सबसे पॉपुलर खेल है। मैंने अपने साथियों से विचार करके और मीडिया के एक बड़े वर्ग को साथ लेकर गली क्रिकेट की शुरुआत की। यह जिम्मेदारी बीट कांस्टेबल और बीट हेड कांस्टेबल को सौंपी कि वह अपने गली मोहल्ले के नौजवानों की एक लिस्ट बनाएं, जो अधिकतर खाली रहते थे या स्कूल ड्रॉप आउट्स थे। लिस्टें बन गईं।”

“इसका एक फायदा यह भी हुआ कि बीट कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल्स अपने इलाके के नौजवानों और बढ़ती उम्र के बच्चों को जानने पहचानने लगे। बीट कांस्टेबल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह अपने बीट की एक एक क्रिकेट टीम तैयार करें, जिसमें 11 खिलाड़ी और तीन चार रिजर्व में लड़के हो। जिन्हें बिल्कुल क्रिकेट खेलना नहीं भी आता था, उनके नाम भी तैयार रखें जाए, ताकि उनको और कामों में लगाया जा सके।”
“शुरू में किसी को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन तीन-चार महीने कोशिश करते-करते चंडीगढ़ के पिछड़े इलाकों में करीब 30 टीमें तैयार हो गई। उम्मीद नहीं थी की इतनी बड़ी संख्या में हमें टीमें मिल जाएगी, लेकिन मिल गई। अब दूसरी समस्या हुई की सबके पास सफेद कमीज पैंट नहीं था। ज्यादातर बच्चों में इतना उत्साह था कि वो खुद या अपने माता-पिता के पीछे पड़कर पैंट-कमीज का इंतजाम कर पाए, लेकिन जो नहीं कर सके, उनका इंतजाम थानों से करवा दिया गया।”
“बीट हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल टीम के मैनेजर बने और एक स्कूल के क्रिकेट ग्राउंड में जहां रात में रौशनी की व्यवस्था थी, इस टेनिस बॉल क्रिकेट मैच का आयोजन किया गया। हिंदी-अंग्रेजी मीडिया की रिजनल मीडिया के लिए भी यह एक नई पहल थी और उन्होंने भी जमकर साथ दिया।”
“शाम छह से रात दस बजे तक यह मैच होते थे। जैसे-जैसे इन मैचेज की खबरें छपने लगी, लड़कों के नाम अखबारों में आने लगे मोहल्लों और बस्तियों से भीड़ उमड़ने लगी। अंत के कुछ मैच और क्वॉर्टर फाइनल सेमीफाइनल और फाइनल तो स्टेडियम में करवाने पड़े।”
“जब दोनों टीमें मैदान में उतरती थीं, लाउड स्पीकर से उनको एक शपथ दिलाई जाती थी कि वह नशे से बचेंगे और अगर उनका कोई साथी नशे की लत में पड़ गया है तो उसे भी समझाएंगे। बीट कांस्टेबल को अपना हमदर्द समझेंगे और वह भी नशे के खिलाफ उन्हें हर संभव सहायता देगा।”
“इन मैचेज की पहली सीरीज करीब तीन महीने चली। इससे बहुत फायदे हुए। पहला तो यह कि बीट स्टॉफ अपने इलाके के नौजवानों, बच्चों और उनके परिवारों को अच्छी तरह से जान गया। लोगों का पुलिस पर विश्वास बढ़ा। परिवारों और इलाके के लोगों से पुलिस का संपर्क बहुत बढ़ा और नशे पर बहुत हद तक काबू पाया गया। मीडिया के माध्यम से तमाम लोगों में पुलिस की छवि बेहतर हुई और चंडीगढ़ के आसपास की शहरों में भी ऐसे प्रयोग किए गए।”
अवकाश प्राप्त आईपीएस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव कहते हैं कि चंडीगढ़ पोस्टिंग के 3 सालों में इस प्रकार की 4 सीरीज हुई. इसका व्यापक सामाजिक असर हुआ. इससे उन्हें काफी संतोष मिला.

अब इस लेख के सार को कुछ प्वॉइंट्स के जरिए समझने की कोशिश करते हैं.
1. प्रदीप जी का उद्देश्य और विजन
प्रदीप कुमार श्रीवास्तव (Pradeep Srivastava) ने आईपीएस की नौकरी के दौरान और बाद में भी समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए कुछ करने का संकल्प लिया था, जो बेहद सराहनीय कदम था। उन्होंने ऐसे युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश की, जो ड्रग्स या बेरोजगारी जैसी विकट समस्याओं से जूझ रहे थे।
2. नशे का बढ़ता संकट
साल 2010–2012 के दौरान पंजाब और चंडीगढ़ में ड्रग्स की समस्या चरम पर थी. अफगानिस्तान–पाकिस्तान होते हुए ये ड्रग्स पंजाब, हिमाचल और चंडीगढ़ के रास्ते दिल्ली तक पहुंचते थे। नशे का असर दो वर्गों में ज्यादा असर था. अमीर वर्ग के लोग महंगे नशे करने लगे थे और गरीब वर्ग के लोगों को सस्ते नशे ने घेर लिया था. इतनी ही नहीं कम उम्र के बच्चे भी नशे की चपेट में आने लगे थे.
3. समस्या की जड़: बेरोजगारी और खाली समय
नशे की गिरफ्त में आए ये युवा स्कूल ड्रॉपआउट थे. रैग पिकर्स यानी कूड़ा कचरा बीनने वाले लोग थे या छोटे-मोटे काम करने वाले थे। इनका अधिकांश समय खाली रहने के कारण नशे की गिरफ्त में आने की संभावना अधिक हो गई थी.
4. समाधान का आइडिया ‘गली क्रिकेट’ के जरिए नशा-निरोध करना
प्रदीप जी ने युवाओं को व्यस्त और सक्रिय रखने के लिए खेलकूद, खासकर क्रिकेट को चुना. बीट कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल को गली-मोहल्लों के युवाओं की सूची तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई. इसका लक्ष्य था कि हर बीट से एक क्रिकेट टीम तैयार करना। और इस टीम के जरिए नशे की जड़ पर चोट करना।
5. पुलिस और समुदाय का जुड़ाव मॉडल
क्रिकेट टीम की लिस्ट तैयार होने से पुलिस और इलाकाई युवक-परिवारों में भरोसा बना. पुलिसकर्मियों को भूमिका देकर बीट पुलिसिंग और स्पोर्ट्स का मजबूत मॉडल खड़ा किया गया।
6. ‘गली क्रिकेट लीग’ की सफलता
3–4 महीनों में क्रिकेट की 30 टीमें तैयार हो गईं। शाम 6 से रात 10 बजे तक रोशनी वाले ग्राउंड में मैच कराए गए। मीडिया ने इस पहल को बड़े स्तर पर कवर किया। इससे खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ा और समुदाय की भागीदारी बढ़ी। लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि क्वॉर्टर फाइनल, सेमीफाइनल और फाइनल स्टेडियम में कराने पड़े।
7. ‘नशा-बचाव शपथ’ वाला अनोखा मॉडल
इसमें हर मैच से पहले लाउडस्पीकर से सभी खिलाड़ियों को नशा-मुक्ति की शपथ दिलाई जाती। खिलाड़ियों से अपील की जाती थी कि अगर कोई साथी नशे में फंस जाए तो उसे समझाएं और पुलिस की मदद लें।
8. सामाजिक प्रभाव और नतीजे
प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पहल की इस असर दिखा कि पुलिस का आम लोगों से संपर्क कई गुना बढ़ गया। बीट स्टॉफ अपने इलाके के बच्चों-युवाओं को नजदीक से जान पाए। नशे पर काफी हद तक नियंत्रण मिला। पुलिस की छवि में बड़े पैमाने पर सुधार हुआ। इससे बड़ी बात चंडीगढ़ मॉडल देखकर आसपास के शहरों में भी इसी तरह के प्रयोग शुरू हुए।
9. चार क्रिकेट सीरीज का आयोजन और दीर्घकालिक असर
प्रदीप श्रीवास्तव के चंडीगढ़ डीजीपी रहते हुए तीन वर्षों में कुल चार गली क्रिकेट सीरीज आयोजित हुईं। सामाजिक परिवर्तन, युवा सहभागिता और पुलिस–जनसहयोग पर गहरा सकारात्मक प्रभाव पड़ा। इन सब कार्यों को लेकर प्रदीप जी कहते हैं कि इस पहल से उन्हें गहरी संतुष्टि मिली।
अगर समाज में, पुलिस में, सेना में, ऐसी सकारात्मक सोच वाले लोग आगे आएं, तो नशा क्या? गरीबी क्या? अशिक्षा क्या? इन सबसे न सिर्फ लड़ा जा सकता है, बल्कि उसको बुरी तरह से परास्त किया जा सकता है. और तो और, भारत को विकसित भारत बनाने के लिए 2047 का इंतजार भी नहीं करना होगा, बल्कि चंद सालों में ही उस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है. बस, हाथ से हाथ मिले और कदम से कदम. अपना भारत सपनों का भारत बन जाएगा.

प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, साल 2010 की शुरुआत से 2012 के अंत तक चंडीगढ़ के डीजीपी रहे. ये वो दौर था, जब पंजाब नशे में डूबा हुआ था. चंडीगढ़ भी नशे का आदी हो रहा था. आजकल प्रदीप जी पर्यावरण संरक्षण और अन्य सामाजिक कार्यों में व्यस्त हैं। करीब 37 साल की सेवा के बाद आईपीएस और चंडीगढ़ के डीजीपी प्रदीप श्रीवास्तव दिसंबर 2012 में सेवानिवृत्त हुए थे. इससे पहले वे दिल्ली, गोवा और अंडमान-निकोबार जैसे स्थानों पर महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किए हैं.
